प्रासंगिकता गांधी की

सितंबर 1924 के साम्प्रदायिक दंगों को लेकर अनसन कर रहे गांधी ने कहा था – मेरा धर्म मुझे सभी को समान रूप से प्यार करना सिखाता है. गांधी ने ताउम्र इस पर अमल किया.

स्वतंत्र भारत में पहला बड़ा साम्प्रदायिक दंगा 1963-64 में हुआ. 1970 का दशक भी ऐसी घटनाओं से अछूता नहीं रहा. 1980 के दशक के अंत में रामजन्मभूमि आंदोलन के चलते हालात भयावह हो गए, तब उत्तरी तथा पश्चिमी भारत में हजारों लोग मारे गए.

1990 में, जब रामजन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था, गांधीवादी डॉ. सुशीला नायर शांति-मिशन पर अयोध्या गयीं. विवादित स्थल के बाहर एक प्रार्थना-साभ आयोजित हुई जिसमें, जैसा कि गांधी के समय में होता था, विभिन्न ग्रंथों के पाठ के साथ भजन भी गाए गये. इन भजनों में एक भगवान राम का पुराना स्तुति गीत भी था जिसकी पंक्ति में गांधी ने अपने समावेशी उद्देश्यों के अनुरूप बदलाव कर लिया था. डॉ. नायर और उनके साथी जैसे ही उस ईश्वर अल्ला तेरो नाम पंक्ति पर पहुंचे, उपस्थित लोगों में से कुछ के प्रतिरोध के स्वर गूंजने लगे. किंकर्तव्यविमूढ़ नायर ने इन लोगों से कहा – हम गांधी जी की तरफ से आये हैं.इसके जवाब में कहा गया – हम गोडसे की तरफ से’. आज भी कुछ लोग गोडसे की मूर्ति बनाकर तथा उनके जन्म एवं मृत्यु की सालगिरह मनाकर उनकी याददाश्त के क़ायम रखने की कोशिश करते हैं.



आज देश की राजनीति पर भाजपा, जो आरएसएस की विचारधारा का राजनीतिक चेहरा है, का वर्चस्व है. आरएसएस गांधी के जिंदा रहते कभी भी उन पर विश्वास नहीं किया – कुछ तो उनके अहिंसा की राह को लेकर, लेकिन अधिक इस कारण कि वे स्वतंत्र भारत में मुसलमानों एवं ईसाईयों के समान अधिकार के पक्षधर थे. अब चूंकि गांधी राष्ट्रपिता हैं, .भाजपा तथा आरएसएस द्वारा उनका सम्मान बतौर फर्जअदायगी किया जाता है. लेकिन साथ ही साथ गांधी को छोटा साबित करने के लिए वे अपने नेताओं का कद ऊँचा उठाते रहते हैं. 2003 में, जब केंद्र में भाजपा सत्ता में थी, संसद के केंद्रीय हॉल में सावरकर का चित्र टांगा गया था. इस बीच भाजपा शासित राज्यों में पाठ्यपुस्तकों में स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी की तुलना में सारकर की बड़ी भूमिका का बखान किया गया है.

2014 से भाजपा फिर से केंद्र में सत्ता में है. गो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समय-समय पर गांधी की प्रशंसा करते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर खुद को मोदी-प्रशंसक कहने वालों का नियमित रूप से गांधी के प्रति व्यवहार शोभनीय नहीं दिखता. सावरकर की अहिंसा/चरखा नीति की दरकिनारी को प्रतिध्वनित करते हुए कट्टर हिन्दू प्रचारक चेतावनी देते हैं कि गांधी के विचारों की बरक़रारी से भारत इस्लामी कट्टरवादिता और ईसाई मिशनरियों का शिकार हो जाएगा. अपनी हिंदूराष्ट्र की परिकल्पना के तहत उनका कहना है कि क्यों न 19वीं शताब्दी के आर्य समाजी विचारधारा के दयानंद सरस्वती को राष्ट्रपिता घोषित कर दिया जाये. 

भारत में धार्मिक बाहुलवाद न कभी जीता जा सका है और न ही कभी जीता जा सकेगा. गो कि 1989-1993 की लगातार होती रक्तपात की घटनायें दोहराई नहीं गयी हैं, लेकिन देश कभी भी साम्प्रदायिक दंगों से दूर नहीं रहा. 2002 में गुजरात और 2013 में कोकराझार तथा मुजफ्फरनगर में पीड़ित मुसलमान रहे, तो 2008 में कंधमाल में ईसाई या 1984 में नई दिल्ली में सिक्ख. कश्मीर घाटी में इस्लामिक कट्टरपंथ ने हिंदूओं को नहीं बख्शा.

आज दुनिया भर में और साथ ही पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथ का उभार तथा देश में हिंदू कट्टरपंथी ताकतों के राजनीतिक उत्थान के हालात में गांधी की सद्भावना के प्रति प्रतिबद्धता अधिक प्रासंगिक है.

(रामचंद्र गुहा की सद्यप्रकाशित पुस्तक गांधी – द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड के उपसंहार के अंश पर आधारित)




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